खुशियाँ बनी बनाई नहीं मिलती

बस हमारी निकली ६ बजे
सब रंगीन कपड़ो में सजे |

गीत गाते हुए निकले हम
पीछे छोड़े सारे गम |
दोस्तों के साथ मारते किलकारी
ताज़ा करते यादें सारी |
फिर आ पहुंचे हमारे घर
जिसका नाम था जवाहर|

उस वातावरण ने हमें घेर लिया
हमारी सारी थक्कान को मिटा दिया|

हममें चाय एक नया उत्साह
सब के मुँह पर सिर्फ एक ही शब्द ” वाह !”

जिसके पहले कोई काम हमें सुझा
हमने की भरपेट पूजा !

पानी पूरी, लस्सी और भेल
फिर खेलें हमने अनेक खेल |

बस में वापिस हम बैठे
खेती बाड़ी को देखने |

रास्ते में हमने देखे अनेक बगीचे
तालाब सरोवर थे जिसके नीचे |

विशाल पहाड़ो को देख मेरा मन हरता
अत्यधिक खुशियों से मेरा ह्रदय भरता |

नीला गगन ऐसा जैसे कांच का शीशा
ऐसे नज़रो को देखने की मेरी थी बरसो से आशा |

ऐसा हसीन सफर था मेरा
की जाने कब रत का अँधेरा छा गया |

कभी न भूलूंगी मैं यह नज़ारे
सुन्दर, खुशहाल और पल प्यारे |

नूपुर रुपारेलिया
९स
आर्य विद्या मंदिर बांद्रा पश्चिम