क्यों हमारी और एक छोटे से बच्चे की मुस्कराहट में इतना अंतर होता हैं ?एक बच्चे की निःस्वार्थ हसीं को देखकर हमें लगता हैं ,कि मानों ईश्वर स्वयम हमारे बीच विराजमान हों lयदि किसी परिचित व्यक्ति से हमारी वार्तालाप हों ,तब शुरुआत में ‘हाउ अरे यु ‘से बातचीत शुरु होती हैं l पर यदि हम थोङा सामय और उस व्यक्ति के साथ व्यतीत करें तोः मानों दिल का चिट्ठा खुल जाता हैं …..
वही मुस्कुराती ‘में ठीक हुँ ‘ वाली हसीं ‘में बहुत परेशान हुँ ‘में परिवर्तित दिखाई पड़ती है. .l

उस हसीं में छुपी हुई होती है ज़िन्दगी की परेशानियाँ और तकलीफ़ें जो मालिक हम सबको अपने कर्मो के मुताबिक प्रदान करता है.l दलाई लामजी कहतें हैं’ प्रसनत्ता कोई पहले निर्मित वास्तु नहीं है ..वह आपके कर्मों से आती है..l प्रसन्ता शब्द अपना मतलब खो देती है यदि उसे दुःख से संतुलित न किया जाए .l दुःख सुःख का पलड़ा कभी भारी तोह कभी हल्का …l

देखा जाए कि हम अपनी ज़िन्दगी का अधिकतम समय और उर्जा रिश्तों और नातों को सँभालने में लगे रहते हैं..l हम इनमें इतना निवेश करतें हैं ,की अपेक्षाओं की लंभी लड़ियाँ बाँध देते हैं ..l यही रिश्ते फिर हममें चोट पहुँचाते है और दुःख का कारण बन जाते है ..l चाणक्याजी कहते हैं ‘सभी दुखों का जड़ लगाव है. “I

अपनी ज़िंदगी बैल जैसे धन इकट्ठा करने में जुड़ जाते हैं …l जीवन आरामदायक और आलिशान व्यतीत करने के चक्कर में अपने मूलवान उसूलों की कुर्बानियाँ करते हैं और फिर यही धन हमारी चिंता का कारण बन जाता है ….l स्पाइक मिलिगन कहते हैं ‘ पैसा आपके लिए खुशियाँ नहीं खरीद सकता लेकिन वह दुःख को कुछ सुखद रूप में अनुभव करा सकता हैं ……l

दूसरों से गृहणा ,तुलना ,भेदभाव, ईशा ,लालच जैसे विकार हमारे भीतर निवास करते हैं ..l हम भौतिकवादी वस्तुएं ,उपकरणों ,यंत्रों में सुख ढूँढ़ते हैं और फिर यही वस्तुएं दुःख का कारण बन जाती है….

खुदा की कायनात कितनी सुंदर और विशाल है. पक्षी ,पौधे, जीव, जंतु ,चाँद तारे इतने संतुष्ट प्रतीत होते हैं …l एहंकार और क्रोध की आग में लिपटा हुआ मनुष्य आत्मसंतुष्ट और खुश क्यों नहीं दिखाई देता ? ईश्वर का बनाया हुआ यह “टॉप ऑफ थी क्रिएशन “मनुष्य सैदव बेचैन और नाराज़ क्यों हैं ?

एरिस्टोटल कहते हैं प्रसनत्ता हम पर निर्भर करती है .l यदि देखने के नज़रिये को बदला जाए, तब हम अवश्य ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं l.उस बतक के समान जो पानी में अपना जीवन व्यतीत करती हैं, पर जब उड़ती हैं तब सूखे पंख लेकर उड़ सकती हैं l

उस ईश्वार के प्रति आभार करें, जिसने हममे सोचने और समझने की शक्ति प्रधान की l…आध्यात्मिक लक्ष्य को सामने रखते हुए अपनी ज़िम्मेदारियां निभाए …बच्चे बुज़ुर्गो की निःस्वार्थ भाव से सेवा करें किन्तु फल की अपेक्षा ना करें …l जब दूसरों की मुस्कराहट की वजह बनेंगे तब स्वयं खुशी महसूस करेंगे ..l

थॉमस मेटॉन कहते हैं ;जब महत्वकांक्षा ख़तम होती है तब ख़ुशी शुरू होती है… संतुलित दिमाग से जैसी कोई सादगी नहीं, संतोष जैसा कोई सुख नहीं, लोभ जैसी कोई बिमारी नहीं ,और दया जैसा कोई पुण्य नहीं …l

जब यह सदगुण हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेंगे ,तब हमारी यह बनावटी, मतलबी और चिंताजनक हंसीं ,उस छोटे से बालक जैसे होगी ….सुंदर और ख़ुशी से भरी ……

Krish jagwani
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AVM BE