फैलाए पंख एक परिंदे ने और भरी नयी उड़ान

घर-गृहस्ती के चौकट से बहार निकला इंसान

देखा उसने उसके सामने एक विस्तृत विश्व

नवीन अनुभव, अद्भुत सौंदर्य समक्ष-पार्श्व,

पता चली उसे नयी संस्कृति, नयी कला, नयी भाषा

और प्रारंभ हुआ जीवन का नया अध्याय, भ्रमण लालसा |

 

धूल, प्रदूषण दैनिक झंझट का दुर्विनाशीय चक्र,

तान-तनाव, अतिकष्ट से जाता मानव क्षीण

ना ही करो दैनिक प्रतिस्पर्धा, कौटुम्बिक वाद-विवादों का ज़िक्र

रोग-भोग का सातत्य कष्ट प्रदान करने में प्रवीण |

परंतु इन समस्याओं में आए एक तेजोमय आशा

तनावों से त्वरित मुक्ति दे भ्रमण लालसा |

 

स्वर्ण का मंडप, हीरों के तोरण

अम्बर के थाली में मनोरमण का भोजन

शांति के कुम्भ से निकली संतृप्ती की सरिता

प्रकृति के पन्ने पर लिखी सुन्दरता की कविता

परसंस्कृति, परधर्म, परज्ञान हुआ अपनासा

ज्ञानप्रसार, स्वानुभव सशक्त करती है भ्रमण लालसा |

 

भ्रमण प्रेम को न बंधन न अनिच्छा

भक्त ढूंढे भगवंत को तो देतें है सदिच्छा

जीवन एक सफ़र हम सब मुसाफ़िर

कोई आस्तिक कोई काफ़िर

पर अगर होगा साथ सभी का , तो होंगे सफल

सफलता मिलती शान्ति से , इस सिद्धांत-वृक्ष का भ्रमण अग्रफल |

 

अगर चाहिए जगत में शान्ति का प्रभाव

एवं न हो सुख समृद्धि का अभाव

एक ध्यास, एक प्रयास, एक अभिलाषा

की जगत शांति के लिए अपरंपार रहे भ्रमण लालसा !

~चैतन्य अमित खेडेकर

कक्षा ८-‘स’

रोल नं. ३०

आर्य विद्या मंदिर (जुहू)