विद्यार्थी शब्द का अर्थ है- “विद्या का इच्छुक ” |  कहा गया है-

“छत्रमेवशीलं  यस्य  सः  छात्रः”

अर्थात विद्यार्थी को छाते के समान शील स्वभाव का होना चाहिए।  जैसे छाता स्वयं धूप , छाँव , पानी -वर्षा का सहकार सुख पहुँचाता है, वैसे ही जो स्वयं कष्ट सहकर विद्याग्रहण करता है, तथा अपने घर, परिवार, समाज एवं राष्ट्र का कल्याण करता है, वह आदर्श छात्र कहलाता है।

विद्यार्थी  बड़े ग्रहणशील भी होतें हैं।  उत्सुकता तथा  जिज्ञासा उनके मुख्या गुण हैं।  एक श्रेष्ठ विद्यार्थी को आध्यात्मिक गुणों, उच्च आदर्शों तथा उत्तम स्वास्थ्य का धनी होना चाहिए।  इसके लिए योग एक उत्तम मार्ग है।

योग जीवन के विज्ञान तथा कला दोनों हैं।  योग न केवल बाल-शरीर को स्वस्थ एवं लचीला बनाता है, अपितु उनमें अनुशासन तथा मानसिक सक्रियता भी लाता है। योग के द्वारा विद्यार्थियों में अवधान तथा एकाग्रता बढ़ती है तथा सृजनात्मक प्रेरणा प्राप्त होती है |

योगासनों के नियमित अभ्यास द्वारा शरीर के विभिन्न जोड़ तथा मेरुदंड स्वस्थ , लचीले तथा सक्रीय बनते हैं।  प्राणायाम के नियमित अभ्यास द्वारा उपलब्ध भावनात्मक स्थिरता, सृजनात्मक एवं भावनात्मक ऊर्जा को मुक्त करता है।  इसके फलस्वरूप अभ्यासी छात्र में आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण तथा स्वचेतना का उचित एवं अधिकाधिक विकास संभव होता है।  अतः आदर्श विद्यार्थी के निर्माण हेतु योग-शिक्षा की भूमिका अतुल्य है।

भार्गवी भदानी

कक्षा- VII-C

AVM JUHU