चिन्ता छोडो खुश रहो
एक आश्रम में संत ने अपने शिष्यों को “चिन्ता छोडओ खुश रहो” के बारे मे प्रवचन देने के लिये इकठा किया । संत ने सभी शिषयों को संबोधित करते हुए एक पानी का आधा भरा ग्लास उठाया । सभी शिष्यों को लगा की गुरुजी बोलेंगे कि ये ग्लास कितना भरा हुआ है, फिर उसके बारे में समझाएँगे । लेकिन उसके विप्रीत गुरुजी ने कहा,” पानी भरे ग्लास का वजन क्या है?” सभी शिष्यों ने ३००-४०० ग्राम का अंदाज़ित वजन कहा । गुरुजी ने कहा, “कुछ भी वजन सोच लो, कोई फर्क नहीं पड़ता”। “फर्क तो एस बात का पडता है कि मैैं इस पानी भरे ग्लास को कितनी देर तक उठा सकता हूँ “। “मैं इस ग्लास को एक मिनिट तक पकडूँ तो क्या क्या होगा? कुछ फर्क नहीं होगा। लेकिन य्ही ग्लास मैं एक घंटे तक उठाके रखूँ तो शायद मेरा हाथ दुखने लगेगा।” अब यही ग्लास मैं एक दिन तक उठाकर रखूँ तो क्या होगा? मेरे हाथ में दर्द बहुत बढ़ जाएगा और हो सकता हेै कि मेरा हाथ लकवा ग्रस्त हो जाये और मैं अपने हाथ को हिला भी न सकूँ “।