ख़ुशियों को पाने के लिए दो चीज़ लगती है। वे है परिश्रम और समय। ख़ुशियाँ खरीदी नही जा सकती है। अगर हम कुछ चाहिए तो हम उसकी खुशी पाने के लिए हमारी पूरी लगन परिश्रम करने में लगा देंगे। यह करने से ही हमे हमारे द्वारा चाहने वाली खुशी मिल सकती है। हम कभी गलत काम करके खुशी नही हो सकते है । इसलिए हमें हमारी सच्ची परिश्रम से ही ख़ुशियाँ प्राप्त करनी चाहिए । सच्ची परिश्रम से सच्ची खुशी मिलती है। इस ख़ुशियों के विषय पर में एक कहानी बताऊँगी।

यह कहानी गीता और बबिता फोगार्ट के असल कहानी के बारे में है। वे अब बहुत अच्छे दंगल के खिलाड़ी है, पर यह खुशी उन्हें बने बनाए नही मिली है। यह उनका परिश्रम का फल है । जब वे दस साल के ही थे तब उनके पिता ने उन्हे दंगल सिखाना शुरू किया । यह उनके लिए आसान नही था । वे जिस गाँव मे थे वहाँ सब लोग उन्हें चिढ़ाते थे कि उनके पिता ने लड़कियों को लड़को जैसा लेकर बाल कटता दिए और दंगल भी सिखा दिया । सीखते सीखते ओर खेलते खेलते वे अच्छे होते लगे और जब वह बहुत अच्छे हो गए और हर खेल जीतने लग उन्हें बहुत खुशी मिली और उन्हें अपनी परिश्रम का खुशी मिला। यह कहानी से हमे पता चलता है कि लगन से परिश्रम करना अंत मे हमारे पास खुशी लाता है।

इस कारण हमें समय और परिश्रम करके जो भी खुशिया हमे चाहिए वह मिल सकती है। हमे इससे पता चलता है कि खुशियाँ बने बनाए नही मिलती।

आरात्रिका घोष

कक्षा 8 ब

आर्य विद्या मंदिर।