जो बंध आखों के सपनों को खुली आखों से जोड़े, वह हैं स्कूल
स्कूल वह हैं जहा सुबह उठ कर आने में बहुत आलस अता है और गेट के अंदर आने से पहले बैज और बाल के बहाने तो बन ही जाते हैं।
स्कूल वह हैं जहा दोस्त हैं, वह दोस्त जिनके बिना अब पूरी ज़िन्दगी बेकार हैं
जिनके साथ क्लास के बहार बंक भी किया है और पूरी शिद्दत के साथ पढ़ाई भी।
जिनके साथ दोस्ती भी की हैं और धुलाई भी
बुरे अंक आने पर जो दिलासा दिलाये और अच्छे अंक आने पर दस बाते सुनाये।
स्कूल वह हैं जहा सब्स्टिटूशन की ख़ुशी हैं और इसी सब्स्टिटूशन में पढ़ने का गम भी।
वोह टीचर की डाट के बाद पीछे मुड़ते ही हंसना हैं स्कूल और उसी डाट में छिपी ज़िन्दगी है स्कूल।
फिर आते हैं वह ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पल, वह दो गेम्स पीरियड, जहा दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं, पूरे पीरियड में गोल उनसे होता नहीं पर यह अगले पीरियड में दो और मिनट मांग लेते हैं।
स्कूल के अंतिम दिन पर बजता पढाई का बज़्ज़र, दोस्त अपना टॉपर है अब किस बात का है डर ?
परीक्षा में XYZ कब अंग्रेजी से गणित में बदल गया, हमें पता ही नहीं चला, पर इन बारह सालो में स्कूल ने ज़िन्दगी जीना दिया हैं सिखा।
स्कूल मंदिर हैं, मस्जिद हैं, गिरजाघर हैं, स्कूल मेरी लाइफ, मेरा सपोर्ट सिस्टम, मेरा सहारा है।
मेरे कागज़ के जहाज़ सपनो के आसमान छूएंगे, यही मेरा दिल कहता है।
स्कूल वह है जहा खुदाए जन्नत लिखता हैं॥

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भूमिका मखीजा
९ A
आर्य विद्या मंदिर बांद्रा (पश्चिम)