अन्तरिक्ष प्यारा

कैसा हो अन्तरिक्ष का नज़ारा
आकाश गंगा हज़ारों तारे ॥

पथरिली धरती हो रोशन चंद्रमा
पंच तत्व से बना आसमां नीला॥

किरणों से सजा सवेरा
रात के तम मे नभ लगे नगीना ॥

नव गृह के सारे सितारे
जैसे हो अनमोल खज़ाने ॥

नक्षत्र और सृष्टि सारी
मिल जुल के व्योम में समाई॥

असंख्य और सहस्रों तारे
कोमदी के आँचल में समाते॥

वित्त और अतुलित संपदा
इसमें है संपूर्ण विश्व अपना ॥

स्वर्ग से सुंदर अंबर
ऐसे लगता जैसे यहीं बसता हो परमेंश्वर॥