पुस्तक से प्राप्त विद्या महत्त्वपूर्ण नहीं कि हमेशा सही हो| वह हमें अनाकर्षित करती है और अधिक समय तक मस्तिष्क में जमता ही नहीं है| जब तक वह किसी दूसरी वस्तु से जुड़ता नहीं है या बदलाव में उसके स्थान पर ज्ञान, जो अनुभव से प्राप्त किया गया है, वह नहीं है, तो वह ज्ञान अप्रायोगिक  हो सकता है| अंत में, जो ज्ञान पुस्तकों में होता है, वह भी अनुभव से ही होता है| परन्तु अनुभव शाश्वत होता है, अतः उसे सदैव विकसित करना चाहिए|

     अगर हम ऐतिहासिक स्थान पर, जैसे आगरा, बीजापुर और अजंता गुफाओ में जाते है, तो जो ज्ञान हमें इतिहास की पुस्तकों से मिलता है, उसमें ज्ञान, रंग, और इच्छा जागरूक करते है| भूगोल को भी पढने में तभी मजा आता है, जब हम स्वयं उस जगह घूम आए| अगर उदहारण दिया जाए तो क्या हम पहले उन चिकित्सकों या वकीलों के पास जाते हैं, जो ज्यादा अनुभवी हो, न कि जो अधिक शिक्षित हो| जीवन के कुछ क्षेत्र में जैसे कि राजनीति हमें अनुभव तो चाहिए ही|

     हमने  बहुत सारे मुहावरे और लोकोक्तियाँ सुनी ही हैं| जब तक हम स्वयं अनुभव न कर लें, तब तक हमें उसका अर्थ समझ में नहीं आता| उदहारण के लिए, मुझे यह मुहावरा कि ‘राई का पहाड़ बनाना’ पता था, लेकिन अर्थ तब तक नहीं पता चला जब तक रमेश मेरे घर पर आकर मुझे बता कर नहीं गया था कि पड़ोस के घर में बहुत बड़ा झगड़ा चल रहा था| जब में उनके घर पर पहुंची, तब पता चला कि केवल किसी बात पर उनका सूक्ष्म विवाद हो रह था| तब मुझे उस मुहावरे का अर्थ पता चला| हम कितनी भी बार कहते हैं कि दोस्त वह होता है जो विपत्ति में सहाय्यक होता है, परन्तु अर्थ तभी ज्ञात होता है, जब हमारा ‘प्रिय’ मित्र धोखा देने का अनुभव हमें करवाता है|

     जो ज्ञान हमें अनुभव से प्राप्त होता है, वह कभी बुलाया नहीं जा सकता है| अगर आप असत्य वचन कहतें हैं एवं फँस जाते हैं, तो उस गलती को पुनर्कृत नहीं करतें हैं| कुछ असफलताएं हमें नाकामयाबी याँ गलतियों का अहसा दिलाते हैं एवं उसको सुधारने के लिए हम निरंतर प्रयास करते हैं| अतः यह उचित कथन है कि अनुभव जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक था, है और सदैव रहेगा|

तक्षिता पटेल

कक्षा: 10 ‘A’ AVM JUHU