अंतरिक्ष
काला- काला आसमान,
सफ़ेद चाँद सफ़ेद तारे,
यह सब लगते कितने प्यारे ।

कभी सोचता अगर तारों में होता घर हमारा,
एक छोटा- सा प्यारा प्यारा।

फिर तारे दिखते कितने पास,
और चाँदनी की होती मिठास।

सूरज भी शायद दिखता पास,
घूमते उसके आठ ग्रह ख़ास।

तारे रचते कितने आकार,
आकार के होते कितने प्रकार।

क्या होंगे वहाँ चॉकलेट के घर।
क्या होंगे वहाँ स्कूल टीचर और सर।

अंतरिक्ष की दुनिया कितनी न्यारी ,
सपनो जैसी प्यारी प्यारी।

राघव सिंग
तीसरी सी
आर्य विद्यामंदिर
बांद्रा – पूर्व