HAND IN HAND WITH MYTHOLOGY: MUSIC

 

Indian music, commonly referred to as ‘Sangeet’ is inherent to mankind. Being derived from myImage result for indian music and mythologythology, it has appeared to form reputation as the roots of a sapling that nurtures growth.  Music has emerged spontaneously,since the beginning of documented culture, parallel in all known human societies. Turning a blind eye to all human atrocities, it has appeared to transcend time, place and culture. More importantly, this product of ‘pure culture’has roused curiosity, only to manifestthe reigning culture.

The ancient Indians believed in the divine origin of music and considered the purest form of sound to be equal to cosmic energy. As a result, music and religion were always closely intertwined.

They documented music in the form of Poetries, Shlokas, Bhajans, Aartis and the most famous – Dohas. Always being the backbone of most Vedic literature these life-like blossoms of Indian history continue to bloom till date only because of the works of some great music artists like Kabir and Rahim.

गहिसरनागतिरामकी, भवसागरकीनाव।रहिमनजगत-उधारको, औरनाकोऊउपाय।।

In the given Doha, Rahim says that to get through this life and world, the only way is through God (Ram).

Hence not only historians but we can also come to a conclusion that the influence of myth
ology on Indian music has been vast and undeniable. From the Vedic times to the modern day, songs about gods have been central to the music of India. Whether it is the naming of the ragas or the invention of music instruments, we Indians have always turned to scriptures and mythology for inspiration. We do not just tell stories about our gods and heroes but sing them for music is divinity manifest.

By KIYOSHI DOLIA

Class: 8 A

School: AVM BandraWest

 

Music is the prayer that every heart sings.

Every morning when we wake up our day starts with listening to the chirps of birds, the rustling of leaves, the ringing of the temple bell and moreover the noise of people on the streets. All of these seem so usual, but if you actually listen to it peacefully; it is music.

For some of us music may just be an activity which we do when we are free. For some it may also be something useless, but at the same time it may also be a healer for somebody else.

Indian mythology tells us that music is prevalent even in the heavens. Goddess Saraswati plays the veena, lord Shiva plays the damru, Krishna plays the Bansuri, and Nandi plays the mridangam. When we go to a temple, a church, a mosque or a gurudwara we hear the havan, pooja, the mass, or the kirtan. This is a form of music. For that matter a child’s cry is also music.

All this makes it clearly evident that any sound that emphasizes on a feeling is music. Thus, music has the power to help and heal. It has the power to attack and defend. It is after all the prayer that every heart sings.

Kanika Kaur Chadha

VIII- B

AVM BANDRA (E)

Music is the prayer every heart sings…

 

“He who sings, scares away his woes.”  “There is nothing in the world so much like prayer, as music is.” are some old, but apt quotes.

 

Some people like to listen to music, many people like to sing, while others, can play musical instruments. Music nourishes us in all its forms. It always makes us feel positive in our outlook to life. In Hindu mythology, Saraswati is the goddess of knowledge, arts, wisdom, music & learning. She is shown playing the veena.

 

The Hindu deity lord Krishna is commonly depicted in a relaxed pose, playing a flute.  When lord Shiva plays the Damru, he plays Omkara – the sound of Aum.

 

Even in Greek mythology the god Orpheus was celebrated as a singer and lyre player and goddess Athena played the Aulos (Flute).

The Greeks also believed that music could have a beneficial effect on both the mind and body of the listener.

 

During festivals we celebrate by playing music.  It is a huge part of wedding celebrations in all cultures. Religious functions are incomplete without devotional music.

Hence we can easily conclude that music is a therapy that every person needs

   

Prisha Singh

Std IV C

V.C.W. A.V.M Bandra East

 

 

सात सुरों से बंधा ब्रम्हांड

 

1

सा- सारे विश्व का ब्रहमा ने किया निर्माण

रे-रेशम जैसे सुर मुरलीधर कृष्ण भगवान

ग-गणेश जी की आरती पूजा सजाएँ

म-माँ सरस्वती बजाए वीणा के मधुर स्वर

प-प्रार्थना की शक्ति असीमित

ध-धरती माँ का करो सम्मान

नी-नियम से करो भगवान का ध्यान

सा-सात सुरों का यही है ज्ञान

 

By-Swaraj.V. Palkar

7A , Arya Vidya Mandir- Bandra West

 

MUSIC MAKING MELODY

Music and mythology have an ancient connection. We must look at mythology to really see the significance that Indian music has to Indian society.

Once, a long time ago, during the transitional period between two Ages it so happened that people took to uncivilized ways and were ruled by lust and greed.  Seeing this plight, Lord Indra and the other gods approached Lord  Brahma and requested him to give the people a toy, but one which could not only be seen but heard and this should form a diversion.

They decided to give the celestial art of sangeet to mankind. The great sage Narada was the first mortal recipient of this divine art. Classical music is considered more than mere entertainment; it is a moral and spiritual redeemer.  Therefore, the divine qualities inherent in the art form imply certain prerequisites; key among them are guru(teacher), vinaya (humility) and sadhana (discipline).

 

Anisha Kenia

Class 5 C

गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व

भारत मे गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है।इस त्योहार का प्रकृति एवम मानव जीवन से सीधा संबंध है।इस पर्व से संबंधित  कथा इस इस प्रकार है।
देवराज इन्द्र को अपने बल  औऱ ऐश्वर्य का बडा अभिमान हो गया था।उनके इस अभिमान को चूर करने के लिए कृष्ण ने एक लीला रची।बृजवासी पकवान बना कर इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे।कृष्ण ने माँ यशोदा से सवाल पूछा कि किसकी पूजा हो रही है औऱ क्यों?
माता ने उत्तर दिया कि वर्षा आने ka karNa देवराज इन्द्र है अतः उनके प्रति आभार व कृत&ता हेतु yaह kamanaaहो रही है ।इस पर कृष्ण कहते हैं कि इन्द्र की पूजा न कर I
गोवर्धन की पूजा करना उत्तम है क्योंकि गाएँ तो वहीं चरने जाती हैं।इन्द्र यह जानकर क्रोध में भर उठते है।
वर्षा शुरु हो जाती है लगातार सात दिन  तक वर्षा होती रही इस  बीच सभी बृजवासी गाय-बछडों समेत कृष्ण की शरण में जाते हैं ।कृष्ण इनकी रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को ही अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लेते हैं ।बलराम के साथ पानी के प्रवाह को रोकते हैं ,गोवर्धन पर्वत के छत्र तले सभी बृजवासियों को व  पशुओं को जीवन दान मिलता है। अंत में इंद्र को एहसास होता है कृष्ण कोई साधारण मानव नहीं है वह ब्रह्मा जी के पास जाते हैं ब्रम्हाजी जब कृष्ण की सच्चाई बताते हैं तो अंदर का अहंकार मिट जाता है एवं कृष्ण से क्षमा मांगते हुए उनकी पूजा करते हैं और उन्हें भोग लगाते हैं किस पौराणिक घटना के बाद गोवर्धन की पूजा होने लगी गायों और बहनों को स्नान करा कर इस दिन उन्हें गुड और चावल खिलाया जाता है इस मिथक में प्राकृतिक संदेशों को मनुष्य तक पहुंचाना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना इस कथा का आधार है ।

नाम चंचल बजोरिया
आठवीं-स
वासुदेव .सी वाधवा,
आर्य विद्या मंदिर बांद्रा पूर्व

गुरू- दक्षिणा

आचार्य दोणाचार्य ।
ऱाजगु$ शिक्षक राजपुत्रों के ।
कौरव और पांङवपुत्रो के अर्जुन य़ा प्रिय शिष्य प्रियतम सब में।

pर था तो अश्वत्थामा पुत्र उनका ,अंश उनका ।
भला बराबरी में उसकी खडा हो सके कोई।

देते आज्ञा शिष्यों को जल लाने की सरिता से।
घट देते शिष्यों को लघु मुख बोल।
जो ले समय अधिक भरने में।

पात्र होता पुत्र का ,खुला बडे मुख का।
भर जल शीघ्र ही लोटते गुरू पुत्र।
समय मिल जाता पिता को,
सिखाते ज्ञान देते शिक्षा विशेष पुत्र को।

ताड ली बात अर्जुन ने।
भागते नदी तट औरो से पहले।
आते लौट शीघ्र ,सहभागी बनने अश्वत्थामा के।
पाते ज्ञान श्रेष्ठ , शिक्षा गूढ़ धनुर्वेद।
खीच न पाए गुरु भी रेखा दोनों के बीच।

बने धनुधारी दोनों ज्ञान के पात्र विशेष अन्य से।
समय बीता ,आया एक भील पुत्र एकलव्य।

ख्याति सुन द्रोण की ,बनने धनुर्धारी
कर प्रणाम । नतमस्तक हो माँगा अनुग्रह।
“देव आया हूँ मागने आपसे विद्या का दान
रहूँगा आज्ञा में,करूँंगा प्रयास बनूंगा धनुर्धर।

बनू कृपा पात्र आपका, मेरे गुरु।
हाय रे विधाता क्रूर व्यंग भाग्य का।
नकारा गुरु ने जिज्ञासु बालक को।
उनकी कृपा के अधिकारी है केवल राजपुत्र,
दीन हीन नही ,तर्क दिया खोखला सा।

नाम- गौरी परदेसी
कक्षा- सातवी “अ”
वासुदेव .सी वाधवा,
आर्य विद्या मंदिर,
बांद्रा पूर्व

गणेशजी का चूहा

कैलाश की चोटी पर, शिवजी के आलय में गणेश जी रहते थे। उनकी मां पार्वती जी का भी यही निवास था। वे सब खुशी खुशी अपना जीवन व्यतीत करते थे। वहीं दूसरी तरफ, गजमुखासुर नाम का एक असुर शिवजी को प्रसन्न करने की कोशिश कर रहा था। वह कठिन तपस्या से भूख, प्यास, सूर्य और हवा की कठोर परीक्षा को जीत चुका था।
जब शिवजी उसके सामने प्रकट हुए तो उन्होंने उसे यह वरदान दिया कि नाही मनुष्य और नाहीं जानवर उसका वध कर सकते है। यह वरदान पाकर गजमुखासुर घमंडी हो गया। उसने पास के गाँव में आतंक कर दिया। उसने लोगों के घरों को बरबाद कर दिया ओर अब तो वह देवताओं के पास जा रहा था। वरदान की वजह से कोई देवता भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। सब देवता शिवजी के पास गए और उनसे प्राथना की के वह उनकी सहायता करें। शिवजी जानते थे कि पूरे विश्व में सिर्फ गणेश जी ही गजमुखासुर का वध कर सकते है। अतः गणेश जी गजमुख के पास गए और उसे युद्ध के लिए ललकारा। जब गजमुखासुर को पता चला कि गणेश जी मनुष्य ओर जानवर के मिश्रण थे तो वह ङर गया और भागने लगा। पर गणेश जी ने उसे पकड़ लिया और अपनी शक्तियों से उसे चूहा बना दिया। उस दिन से गजमुखासुर एक चूहा बन गया और गणेश जी का वाहन।

By Priya Misra, Class 7A, AVMBW

गुरुभक्त एकलव्य

एकलव्य की कथा का वर्णन महाभारत में मिलता है। उसके अनुसार एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। वह गुरु द्रोणाचार्यके पास धनुर्विद्या सीखने गया था, लेकिन राजवंश का न होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। तबएकलव्य ने द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई और उसे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एक बार गुरु द्रोणाचार्य केसाथ सभी राजकुमार शिकार के लिए वन में गए।
 
उस वन में एकलव्य अभ्यास कर रहा था। अभ्यास के दौरान कुत्ते के भौंकने पर एकलव्य ने अपने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया।जब द्रोणाचार्य व राजकुमारों ने कुत्ते को इस हाल में देखा तो वे उस धनुर्धर को ढूंढने लगे, जिसने इतनी कुशलता से बाण चलाए थे।एकलव्य को ढूंढने पर द्रोणाचार्य ने उससे उसके गुरु के बारे में पूछा। एकलव्य ने बताया कि उसने प्रतिमा के रूप में ही द्रोणाचार्य कोअपना गुरु माना है। तब गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिनाकुछ सोचे अपने अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया।
 
By KEISHA D’SOUZA, Class 3B, AVMBW