यादे इन दिनों की

आज से बीस साल के बाद,

जब हम अपनी-अपनी ज़िन्दगी में डूब जायेंगे,Image result for childhood memories wallpaper

दफ्तर, नौकरी, परिवार के साथ,
मन के किसी कोने में रहेंगी आज -कल की बात?

जब रेडियो पर २०१६ का गाना बजेगा,
क्या हम इसी तरह जी भर के गा पाएंगे ?
या हम सुनकर, यादो में सिर्फ खो जाएंगे?

पाठशाला में मित्र से लड़ाई-झगड़ा,
अध्यापिका  की डाँट,
दोस्तों से हँसी-मज़ाक का सिलसिला ,
क्या हर पल, हर कदम हम भूल पाएंगे?

हर सहेली का चेहरा,हर टीचर की वाणी,
हम सब को आज लगती है जो प्यारी,
परंतु जैसे समय का पहिया घूमेगा ,
यह पल भी हमारे मन से मिट जायेंगे|

यह  ज़िन्दगी का सुनहरा पन्ना ,
हर दिन,हर पल को जी भर के जीना,
ओस की  बूंदो जैसे यह यादे भी मिट जाएंगी ||

Jaee Ponde

Class 8C
Arya Vidya Mandir Bandra (West)

विस्मृति भी वरदान है……..

जीवन मे कभी-कभी कुछ प्यारा-सा खो जाता है,Image result for memories wallpaper
प्रियतम वस्तु के खो जाने से,
जीवन फिर अर्थहीन-सा हो जाता है।

मेरी सुख स्मृति, मेरे बचपन के मज़ेदार दिन  है,
पीछे मुड़ कर हम कभी उन पलों को नहीं पाएँगे,
सुख के लम्हे-दुख के लम्हे खो जाएँगे,
आनेवाला दिन कुछ नया दिखाएगा।

कुछ खो जाने से समय नहीं थम जाता है,
जीवन की गति चलती रहेगी,
दुख के क्षण पीछे छूट जाएँगे।

स्मृति जैसे मनुष्य के मन का मान है,
विस्मृति मनुष्य को प्रभु का वरदान है,
दोनों के होने से जीवन आसान है!

By Prerna premchandani
Roll no 16
8B

सुखद  स्मृति

    
स्मृतियाँ हमारे जीवन में सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं जो हमें अपने अतीत में फिर से जीने के लिए आग्रह करती हैं।इसी के साथ मैं अपने बचपन की एक सुखद स्मृति बाँटना चाहती हूँ। जब मैं छोटी थी, तब मैं हर रोज़ अपनी नानी के घर अपने छोटे भाkkkkkई के साथ खेलने जाती थी।तब कोई पढ़ाई का बोझ न था। वहाँ हम दोस्तों के साथ खेलते और खूब मस्ती करते। छुट्टियों के दिन देर से सोते और देर से उठते। फिर एक रात हमने फ़ैसला लिया कि हर छुट्टी की रात, हम कुछ नया और मज़ेदार करेंगे। उसके बाद धीरे-धीरे हम बाहर जाने लगे। कभी-कभी हम बाहर से ‘चोको बार’ की  आइस-क्रीम मँगाते या ठंडी हवा का मज़ा उठाकर बग़ीचे में टहलते। इसे हम “नाइट वॉक” बुलाने लगे।एक रात हमारे दोस्त के मामाजी ने हमें उनकी बड़ी गाड़ी में घुमाने के लिए ले गए।हम सब जाने के लिए बहुत उत्साहित थे। हम देर रात को अपने रात के कपड़ो में नीचे उतरकर जल्दी से गाड़ी में बैठ गए।जैसे ही मामाजी ने गाड़ी चलाना शुरू कर दिया
हमने खिड़की के काँचों को नीचे किया और हम ज़ोर ज़ोर से गाना गाने लगे। उसके बाद हम बहुत मज़ाक़ करने लगे और पागलों की तरह अपने नाक से जान बूझकर हँसने लगे।लौटने के बाद हम सीधा घर गए।मैंने कभी पहले इतना मज़ा नहीं किया जितना मैंने उस रात किया।काश मैं फिर से “नाइट वॉक” के लिए जा सकूँ।
– प्रिशा पंजवानी
कक्षा- आठवीं ‘अ’
आर्य विद्या मंदिर बांद्रा (पश्चिम)