मिल-बाँटकर रहने में ही सच्चे सुख की अनुभूति हैं

मिल बाँटकर  रहने से हमें सुख के साथ आशीर्वाद भी मिलता है। अगर हम किसी को अपने पुराने कपड़े या किताबें देते   चेहरे पर सुख देखकर कितनी खुशी होती है। इससे हमें उनके आशीर्वाद के साथ-साथ सुख का अनुभव ही होता है। इस विषय पर एक बहुत मनोरंजक कहानी है जो हमें मिल बांटकर रहने का महत्त्व बताती  हैं। 
एक छोटे गांव में दो अच्छे मिटक रहते थे। उनका नाम अरुण और रमज़ान था। दोनों मित्र  रोज़  नदी के किनारे जाकर मिल  जुल कर खेलते थे। एक दिन जब वे दोनों नदी के किनारे से खेलकर घर लोट रहे थे ,उन्हें रस्ते में एक भिकारी मिला। उस भिखारी के पास कुछ खाने या पीने के लिए नहीं था। अरुण और रमज़ान के पास कुछ खाना था। रमज़ान ने अरुण को कहा “अरुण,मुझे इतनी भूख नहीं है ,और तुमने भी अभी-अभी आम खाया है तो हम अपना सारा खाना इस भिखारी को दे देते है।” अरुण ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और उसने कहा “मैं अपना खाना नहीं दूँगा।”रमज़ान ने अरुण की बात पर ज्यादा ध्यान  नहीं दिया  और अपना सारा खाना भिखारी को दे दिया। उसे बदले में कुछ नहीं मिला पर उसे सुख की प्राप्ति हुई। वे बहुत कुश हो गया और उसे बदले में कुछ नहीं चाहिए था। इस कहानी से हमें  सीख मिलती हैं की ज़रूरी नहीं हैं की हमें हमारे अच्छे कर्मों के लिए बदले में कोई चीज़  मिलेगी,पर हमें अच्छे कर्म करने पर हमें एक ऐसी सुख की प्राप्ति होती हैं जो हज़ार चीज़ों  भी अधिक होती हैं। जैसे सभी कहतें हैं की अच्छे कर्म करने का इनाम अच्छा होता है। तो जभी कुछ अच्छा करके हम कोई इनाम कमाते हैं  हमारे लिए सबसे बड़ा और अच्छा होता हैं। 
रिया श्रीवास्तव १० बी 

AVM JUHU