गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व

भारत मे गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है।इस त्योहार का प्रकृति एवम मानव जीवन से सीधा संबंध है।इस पर्व से संबंधित  कथा इस इस प्रकार है।
देवराज इन्द्र को अपने बल  औऱ ऐश्वर्य का बडा अभिमान हो गया था।उनके इस अभिमान को चूर करने के लिए कृष्ण ने एक लीला रची।बृजवासी पकवान बना कर इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे।कृष्ण ने माँ यशोदा से सवाल पूछा कि किसकी पूजा हो रही है औऱ क्यों?
माता ने उत्तर दिया कि वर्षा आने ka karNa देवराज इन्द्र है अतः उनके प्रति आभार व कृत&ता हेतु yaह kamanaaहो रही है ।इस पर कृष्ण कहते हैं कि इन्द्र की पूजा न कर I
गोवर्धन की पूजा करना उत्तम है क्योंकि गाएँ तो वहीं चरने जाती हैं।इन्द्र यह जानकर क्रोध में भर उठते है।
वर्षा शुरु हो जाती है लगातार सात दिन  तक वर्षा होती रही इस  बीच सभी बृजवासी गाय-बछडों समेत कृष्ण की शरण में जाते हैं ।कृष्ण इनकी रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को ही अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लेते हैं ।बलराम के साथ पानी के प्रवाह को रोकते हैं ,गोवर्धन पर्वत के छत्र तले सभी बृजवासियों को व  पशुओं को जीवन दान मिलता है। अंत में इंद्र को एहसास होता है कृष्ण कोई साधारण मानव नहीं है वह ब्रह्मा जी के पास जाते हैं ब्रम्हाजी जब कृष्ण की सच्चाई बताते हैं तो अंदर का अहंकार मिट जाता है एवं कृष्ण से क्षमा मांगते हुए उनकी पूजा करते हैं और उन्हें भोग लगाते हैं किस पौराणिक घटना के बाद गोवर्धन की पूजा होने लगी गायों और बहनों को स्नान करा कर इस दिन उन्हें गुड और चावल खिलाया जाता है इस मिथक में प्राकृतिक संदेशों को मनुष्य तक पहुंचाना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना इस कथा का आधार है ।

नाम चंचल बजोरिया
आठवीं-स
वासुदेव .सी वाधवा,
आर्य विद्या मंदिर बांद्रा पूर्व