गुरू- दक्षिणा

आचार्य दोणाचार्य ।
ऱाजगु$ शिक्षक राजपुत्रों के ।
कौरव और पांङवपुत्रो के अर्जुन य़ा प्रिय शिष्य प्रियतम सब में।

pर था तो अश्वत्थामा पुत्र उनका ,अंश उनका ।
भला बराबरी में उसकी खडा हो सके कोई।

देते आज्ञा शिष्यों को जल लाने की सरिता से।
घट देते शिष्यों को लघु मुख बोल।
जो ले समय अधिक भरने में।

पात्र होता पुत्र का ,खुला बडे मुख का।
भर जल शीघ्र ही लोटते गुरू पुत्र।
समय मिल जाता पिता को,
सिखाते ज्ञान देते शिक्षा विशेष पुत्र को।

ताड ली बात अर्जुन ने।
भागते नदी तट औरो से पहले।
आते लौट शीघ्र ,सहभागी बनने अश्वत्थामा के।
पाते ज्ञान श्रेष्ठ , शिक्षा गूढ़ धनुर्वेद।
खीच न पाए गुरु भी रेखा दोनों के बीच।

बने धनुधारी दोनों ज्ञान के पात्र विशेष अन्य से।
समय बीता ,आया एक भील पुत्र एकलव्य।

ख्याति सुन द्रोण की ,बनने धनुर्धारी
कर प्रणाम । नतमस्तक हो माँगा अनुग्रह।
“देव आया हूँ मागने आपसे विद्या का दान
रहूँगा आज्ञा में,करूँंगा प्रयास बनूंगा धनुर्धर।

बनू कृपा पात्र आपका, मेरे गुरु।
हाय रे विधाता क्रूर व्यंग भाग्य का।
नकारा गुरु ने जिज्ञासु बालक को।
उनकी कृपा के अधिकारी है केवल राजपुत्र,
दीन हीन नही ,तर्क दिया खोखला सा।

नाम- गौरी परदेसी
कक्षा- सातवी “अ”
वासुदेव .सी वाधवा,
आर्य विद्या मंदिर,
बांद्रा पूर्व