अंतरिक्ष – भारतीय योगदान

वर्तमान युग अंतरिक्ष और कम्प्यूटर का युग है। अंतरिक्ष का न तो आरंभ है और न अंत । यह एक ऐसा विशाल शून्य है जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है । सभी चीजों- आकाश गंगाओं, ग्रहों, नक्षत्रों, धूमकेतुओं, ब्लैक होल्स आदि का इस में समावेश है । यह एक बड़ा विशाल रहस्यमय और अलौकिक ब्रह्मांड है । मानव प्रारंभ से ही अंतरिक्ष में यात्रा करने का स्वप्न देखता रहा है । आकाश-यात्रा की काल्पनिक कहानियां और कथाएं हमारे साहित्य में प्रारंभ से ही रही हैं । रॉकेट का आविष्कार अंतरिक्ष-यात्रा की ओर पहला महत्वपूर्ण कदम था । इनकी सहायता से कृत्रिम उपग्रह छोड़ने का क्रम प्रारंभ हुआ । रूस ने पहले स्युतनिक आकाश में छोड़े । उसने सर्वप्रथम लायका नामक

 एक कुतिया को रॉकेट के माध्यम से अंतरिक्ष में भेजा । फिर युरी गगारिन सबसे पहले अंतरिक्ष में गये । चंद्रमा पर मानव की विजय एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसका श्रेय अमेरिका को जाता है । उसके दो एस्ट्रॉनॉट्‌स सबसे पहले चन्द्रमा की धरती पर उतरे थे । मानव की ज्ञान-पिपासा का कोई अंत नहीं । जैसे-जैसे उसका अंतरिक्ष-ज्ञान आगे बढ़ता है, उसकी जिज्ञासा और भी बढ़ती जाती है ।भारत भी अंतरिक्ष अनुसंधान और अन्वेषण में लगा हुआ है । लेकिन रूस और अमेरिका की तुलना में अभी बहुत पीछे हैं । 3 अप्रैल, 1984 के ऐतिहासिक दिन भारत का पहला व्यक्ति अंतरिक्ष में गया था । वह व्यक्ति राकेश शर्मा थे । 

यह रूस और भारत के बीच एक लम्बे सहयोग का परिणाम था ।भारतीय मूल की अमेरिकी नागरिक कल्पना चावला पहली ऐसी महिला हैं जिन्हें अंतरिक्ष में जाने का सुअवसर मिला ।

यशना पंडित

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आर्य विद्या मंदिर बांद्रा पश्चिम